Author: abhiraj singh

लो दिन बीता लो रात गयी

सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा, डूबा, संध्या आई, छाई, सौ संध्या सी वह संध्या थी, क्यों उठते-उठते सोचा था दिन में होगी कुछ बात नई लो दिन बीता, लो …

क्या है मेरी बारी में

जिसे सींचना था मधुजल से सींचा खारे पानी से, नहीं उपजता कुछ भी ऐसी विधि से जीवन-क्यारी में। क्या है मेरी बारी में। आंसू-जल से सींच-सींचकर बेलि विवश हो …

ख़याले नावके मिजगाँ में बस हम सर पटकते हैं

ख़याले नावके मिजगाँ में बस हम सर पटकते हैं । हमारे दिल में मुद्दत से ये ख़ारे ग़म खटकते हैं । रुख़े रौशन पै उसके गेसुए शबगूँ लटकते हैं । कयामत है मुसाफ़िर रास्तः दिन …

गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में

गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में नहीं ये है गुलाले-सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे ये आशिक की …

ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वह बाहर निकलते हैं

ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वह बाहर निकलते हैं । अभी से कुछ दिल मुज़्तर पर अपने तीर चलते हैं । ज़रा देखो तो ऐ अहले सखुन ज़ोरे सनाअत को । नई …

प्रकृति-सन्देश

प्रकृति-सन्देश पर्वत कहता शीश उठाकर, तुम भी ऊँचे बन जाओ। सागर कहता है लहराकर, मन में गहराई लाओ। समझ रहे हो क्या कहती हैं उठ-उठ गिर-गिर तरल तरंग भर …

नयनों की रेशम डोरी

नयनों की रेशम डोरी से अपनी कोमल बरज़ोरी से। रहने दो इसको निर्जन में बाँधो मत मधुमय बन्धन में, एकाकी ही है भला यहाँ, निठुराई की झकझोरी से। अन्तरतम …

पुराने बगीचे में

पुराने बगीचे में पूरे अट्ठारह साल बाद एक मुरझाते हुए कम व्यस्त बगीचे में फिर बैठा दिखा मैं यों अपने आपको: बेहद साधारण और अतिशय फुर्सत में रहने वाला …

किला जयगढ़: सात कविताएं

किला जयगढ़: सात कविताएं 1 नीलचिडि़यों के भीतर से बीत रही कोई दुपहरी नहीं एक खाली पड़ी बावड़ी है-यह दिन वर्ष बुर्जों और गोखों में छिप कर बैठ गए …

द्वारकाधाम : तीन कविताएं

द्वारकाधाम: तीन कविताएं एक यों कहने को तो मारी जा चुकी हैं ओखा के सागर की मछलियां पर धरती के नथुनों में छोड़ गया है अजस्त्र दुर्गंध उनकी अनसुनी …

वह सिर्फ रंग नहीं

वनस्पतियों में हरा सिर्फ वह रंग नहीं है जिसकी वजह से वनस्पतियां हरी हैं सिर्फ पंख नहीं वे जो चिडि़यों को उड़ा कर हजारों कोस लम्बे सफर ले जाते …