Author: अभिनय शुक्ला

“कवी” जन्म जन्मांतर

एक कवी जिसकी कल्पना की कहानी उसकी जुबानी कागज़ के ढेर मौसम के पेड़ गर्मी की बात सुर्ख़ियों में आज जीवन से दौड़ जीवनी की ओर जूझता कठनाईयों से …

ये इमारतें

ये इमारतें बड़ी-बड़ी, इन शहरों की इनमें रहने वाले लोग, हमारे गावों के देखतें है उचाईयों से, गरीबों के सपनों को सपने उन गरीबों के, जो पालते है पल-पल …

चल दिये चाँद की ओर

हुई जो उनसे, पहली मुलाक़ात ख्यालों की बारिश में, भींग से गए जो मिले हम उनसे, दूसरी दफ़ा हमारे कलमों के नोक भी, जैसे टूट से गए चाँद-तारें नज़र …

रोमैंस की डायरी पे एक कलम, शीर्षक “आवागमन”

चलो कहीं चलतें हैं, (भवें ऊपर की तरफ उठाते हुए ) “हम्म?” नहीं-नहीं कुछ भी नहीं, (थोड़ी देर बाद) चलो कहीं चलतें हैं, (मुँह में कुछ चबाते हुए) “क्या?” …

ये नहीं मानते (अन्त्तिम कविता)…

ये,नहीं मानते… वस्तु,को वस्तु… प्रेम,को प्रेम… इच्छा में शक्ति … और खुद की अभिव्यक्ति को सही ……………………… ये नहीं मानते… विचारधारा को… जीवनशैली को… व्यस्तता को… और खुद पर …

एक चिड़िया, करती तंग मुझे

एक चिड़िया, करती तंग मुझे दिन-रात सताती रहती है, वो खिड़की पर ही रहती है चुलबुल सी है,मस्तानी सी यूँ आती है, यूँ जाती है एक चिड़िया करती तंग …

“कोई जवाब नहीं “

तुम कहती थी ना… ‘मैं’ लिखाता नहीं… लो, मैंने लिख दिया चंद अल्फ़ाज़ ही सही जमानेवालों के नाम.. क्या लिखा ? क्यों लिखा ? ‘ख़ुद’ की तन्हाईयों से पूछो …

एक बात ‘जो तुम्हारे बारे में है’..

जानती हो क्या कहते है लोग कहते है की लिखता हूँ, तुम्हारे बारे में हर बात होती है तुमसे जुड़ी, तुम्हीं पे सिमटी शायद, सही कहतें है इस प्रेरणा …

“सफरनामा”

फिर वही कड़ियाँ, वही गूँज……. वही पेड़ों की कतारें, वही हरियाली… लिखता हूँ इनके बारे में, एक बार फिर… बैठी है वही जमात, एक बार फिर,,, खिड़कियों पर…. प्रपंच …