पर कौन सुनेगा उसकी

शाम को आने मे थोड़ी देरी
हो गयी उसको
घर का माहौल बदल चुका
था एकदम
वो सहमी हुई सी डरी डरी
आती है आँगन मे
हर चेहरे पर देखती है
कई सवाल

सुबह का खुशनुमा माहौल
धधक रहा था अब
उसके लिए बर्फ से कोमल हृदय मे
दावानल सा लग रहा था
वो खामोश रह कर सुनती है बहुत कुछ
और रोक लेती है नीर को
आँखो की दहलीज पर

पहुचती है अपने कमरे मे
जहाँ वो रो सकती है
यहाँ उसे डर नही लगता है
रोने मे
जहाँ की दीवारो पर नमी
हमेशा बरकरार ही रहती है
उसकी सबसे अज़ीज दुनियाँ
उस कमरे मे ही है अब तक

कभी वो वहाँ एक स्वपन देखती
है, जिसमे चुन लेती है अपना राजकुमार
कभी खुशी मे नाचने लगती है
अनायस्स ही कुछ सोचकर
कभी कभी तो आंशू भी गिर जाते है
हस्ते हस्ते उसकी आँखो से

समुद्र की लहरो की तरह
विचार आते है उसके मन मे भी
वो एक डोर से बधी है
जिसका छोर बहुत से हाथों मे है
वो उड़ना चाहती है पतंग की
तरह
पर अपने ही आसमान मे जहाँ
बाज और गिद्धों का ख़तरा ना हो

वो बुनती है उड़ानो के बटन
ख़यालो की कमीज़ मे
कभी वो ओढ़ लेती है दुपट्टा पुराना
जिस पर कभी सितारे हुआ करते थे
वो रेडियो जॉकी बनना चाहती है
पर घर मे गुमसुम ही रहती है ||

वो बहुत कुछ कहना चाहती है
पर कौन सुनेगा उसकी ||

12 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 18/07/2017
    • shivdutt 18/07/2017
  2. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 18/07/2017
    • shivdutt 18/07/2017
  3. arun kumar jha arun kumar jha 18/07/2017
  4. babucm babucm 18/07/2017
    • shivdutt 18/07/2017
  5. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 18/07/2017
    • shivdutt 18/07/2017
    • shivdutt 18/07/2017

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