सुनता हूँ गान के स्वर / अज्ञेय

सुनता हूँ गान के स्वर ।
बहुत से द्रुत, बाल-चपल, तार,
एक भव्य, मन्द्र गंभीर, बलवती तान के स्वर ।

मैं वन में हूँ
सब ओर घना सन्नाटा छाया है
तब क्वचित‍
कहीं मेरे भीतर ही यह कोई संगीत-वृन्द आया है ।
वन-खण्डी की दिशा-दिशा से
गूँज-गूँज कर आते हैं आह्वान के स्वर ।
भीतर अपनी शिरा-शिरा से
उठते हैं आह्लाद और सम्मान के स्वर,
पीछे, अध-डूबे, अवसान के स्वर ।
फिर सब से नीचे, पीछे, भीतर, ऊपर,
एक सहस आलोक-विद्ध उन्मेष,
चिरन्तन प्राण के स्वर ।

सुनता हूँ गान के स्वर
बहुत से द्रुत, बाल-चपल, तार;
एक भव्य, मन्द्र गम्भीर, बलवती तान के स्वर ।

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