है धूल में ही मूल समाया

कहे कुम्हार है यह माटी

जो उगले हरदम  हीरे मोती

 

यह देती जीवन दान है

उपजाती धन धान है

 

धूल कहो यॉ कह लो माटी

कैसे  कैसे आकार रचाती

रंग बिरंगे फूल खिलाती

बीहड जंगल पहाड़ बनाती

 

इसी से उपजे इसी में जाना

है  ग़ज़ब  यह  ताना  बाना

 

माटी का माटी में मिलना

खिलके फूल का धूल में सिमटना

भाता बहुत है खिलना खिलाना

मगर इक दिन तो ,सब है जाना

है जीवन क्रम चॉद सूरज का ढलना

जादू हर पल नियति का चलना

किसी का आना किसी का जाना

है  ग़ज़ब  का  ताना  बाना

 

है  उपकार  बड़ा माटी का माना

स्वरूप से उसके ,जीवन को जाना

देन है इसकी यह  सुन्दर काया

जब जाना है ,सब छोड़ के जाना

 

जब देखा सब

,तब हमने पाया

इस धूल में  ही

है  मूल समाया

न जाने  क्यूँ

,यह खेल रचाया

जग  को  जाने  क्यूं  भरमाया

रंग बिरंगा  जाल सजाया

 

 

 

 

 

16 Comments

  1. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 14/07/2017
  2. श्याम दत्त मिश्रा श्याम 14/07/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 16/07/2017
  3. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/07/2017
  4. babucm babucm 14/07/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/07/2017
  5. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 14/07/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/07/2017
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/07/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/07/2017
  7. Madhu tiwari Madhu tiwari 14/07/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/07/2017
  8. arun kumar jha arun kumar jha 14/07/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/07/2017
  9. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 16/07/2017

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