काँपते हैं गीत मेरे

काँपते हैं गीत मेरे
सुर पतझर बन गए
शब्द अपनी धुन में रहे
स्वर नश्वर बन गए

दूर नभ में फैलती थी
लय कोकिल कंठ की
वीरान में चीत्कार है
किसी रिक्त कंठ की

वेदना से गीत के थे
बोल भंवर बन गए
काँपते हैं गीत मेरे
सुर पतझर बन गए

विष से भरा अमृत कलश
मन को वो दे गए
बन जाय अभिशाप क्षण में
वर ऐसा दे गए

है मन मंदिर उन्हीं का
जो पत्थर बन गए
काँपते हैं गीत मेरे
सुर पतझर बन गए

कल्पना की आरती के
शब्द दीप हैं सभी
तेरा अधर पट खोलता
गीत मीत था कभी

अब नयन को ही रिझाने
अश्रु भोंरे बन गए
काँपते हैं गीत मेरे
सुर पतझर बन गए

गीत गुंजन में कभी भी
कुछ कम्पन था नहीं
शब्द बंधन की वेदना
थी ना बिलकुल कहीं

पीर के घुंघरू सभी अब
बन अक्षर रह गए
काँपते हैं गीत मेरे
सुर पतझर बन गए

—-      ——-     —-      भूपेंद्र कुमार दवे

 

00000

7 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 11/07/2017
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 11/07/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/07/2017
  4. arun kumar jha arun kumar jha 11/07/2017
  5. chandramohan kisku chandramohan kisku 11/07/2017
  6. Madhu tiwari Madhu tiwari 11/07/2017

Leave a Reply