मगर, वह है कि नहीं आती (भाग-4)

मगर, वह है कि नहीं आती (भाग-4)
03.07.2017: के कुछ और दास्तान:

(1).

मैंने देखा, विदाई के दौरान पहली बार मेरे ही सामने
एक बुलबुल ने निगल लिया अनार के तीन-चार दाने
लगता है याद दिलाना चाहता था मुझको इसके माने।

तुरंत याद आ गया, वह शगुन जो हमारे यहाँ मनाया जाता है
दही या मीठा विदा होने वाले, को अक्सर खिलाया जाता है।

तब हुआ जुदाई का एहसास
दिल में एक दर्द उभर आया
अचानक लगा दिल भर आया।

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(2).
जिस तरह, पहले, बच्चे घोंसले में बैठा करते थे सटकर
एक का मुंह उत्तर, दूसरे का दक्षिण हुआ करता था अक्सर।

ठीक उसी अंदाज़ में दोनों टहनी पर आज बैठे थे
मैं समझता हूँ यह आखिरी बार है, जो ऐसे बैठे थे।

यह उनके बीच की मोहब्बत का अद्भुत नज़ारा था।
उनके बैठे रहने का यह अंदाज़ कितना प्यारा था!

जब बच्चे अमरूद की शाख़ पर बैठे थे, धूप निकली थी
कुछ ही अरसे के बाद, काफी तेज बारिश होने लगी थी।

मैंने स्नान करने के बाद देखा-
उसी जगह बैठे-बैठे पहला भी भीग रहा था, दूसरा भी भीग रहा था।
मैंने डाल को झुकाया, छाता तान दिया था, अब सिर्फ मैं भीग रहा था।

छाते को टहनियों के बीच फंसा कर, मैं अंदर कमरे में जब आया हुआ था।
पानी की बूँदें कम हुईं, बुलबुल उड़ाकर उन्हें, दूसरी जगह बिठाया हुआ था।

04.07.2017: सुबह
05:25 AM: हल्की बूंदा-बांदी
एक बच्चा, अमरूद की टहनी पर दिखा
बड़ा बुलबुल चारा दबाए नज़दीक दिखा।

बच्चा,
मेरे सामने ही,
फुर्र से उड़ने लगा, दूर जाने लगा !
मानों, मुझ से कहता जा रहा हो-
‘देख लो, ऐ मेरे आशिक़  मेरे चाहने वाले
देख लो, ऐ आदम की औलाद, मेरे दीवाने
मैं उड़ सकता हूँ
अपनी राह तय कर सकता हूँ
अब मैं उड़ रहा हूँ
दूर गगन में जा रहा हूँ!’

04.07.2017: शाम
06:10 PM: हल्की बूंदा-बांदी

घर के पीछे
आंगन की दीवाल पर
अचानक मेरी नज़र पड़ी, एक बच्चा बैठा हुआ दिखा
बुलबुल भी उसके पास मुंह में चारा दबाए हुए दिखा।

बच्चा,
मेरे सामने ही,
फुर्र से उड़ने लगा, दूर जाने लगा !
मानों, मुझ से कहता जा रहा हो-
‘देख लो, ऐ मेरे आशिक़, मेरे चाहने वाले
देख लो, ऐ आदम की औलाद, मेरे दीवाने
मैं उड़ सकता हूँ
अपनी राह तय कर सकता हूँ
अब मैं उड़ रहा हूँ
दूर गगन में जा रहा हूँ!’

दूर गगन में जा……….

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(3).
ए कैसी, ए कैसी मोहब्बत है…?
चाहते हम हैं कि हो जाए जुदाई !
गम की घटा छा जाती है, जब होती है जुदाई।

छा जाता है फ़िज़ा में, एक सन्नाटा-सा
रंज होता है बहुत, हर  जुदाई के बाद।

कोई तो दर्द है, जो छुपा होता है, गहराई तक सीने में
अश्क़ बन के छलक जाता है जो, हर जुदाई के बाद।

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(4).
अब वह आए न आए, अब तो न कोई मेरी चाहत है
आना हो अगर उसको, तहे दिल से मगर स्वागत् है।

जब कभी वह आएगी, खिड़कियां क्या?
मेरे दिल का दरवाज़ा भी खुला पाएगी;
जब कभी वह आएगी, अपने घोंसले को
मौजूदा हालात में, महफूज़ जरूर पाएगी।
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मगर, वह है कि नहीं आती।
मगर, वह है कि …

Dated: 10.07.2017
Place:  Azamgarh.
।समाप्त।

…र.अ. bsnl

10 Comments

  1. babucm babucm 10/07/2017
  2. SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 10/07/2017
  3. arun kumar jha arun kumar jha 10/07/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 10/07/2017
  5. raquimali raquimali 11/07/2017
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 11/07/2017
  7. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/07/2017
  8. chandramohan kisku chandramohan kisku 11/07/2017
  9. raquimali raquimali 11/07/2017

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