एक बहन थी मेरी

शीर्षक-एक बहन थी मेरी
एक बहन थी मेरी,
सावली सी सलोनी सी
एक प्यारी गुडिया सी
थाम मेरी उँगलियाँ
वो चलती थी
आगे बढती थी
वो राखी की डोर थी
वो मेरे चारो ओर थी
कब मेले में उसने मेरा हाथ छोड़ा
मैं नहीं जानता था
उसने मेरा साथ छोड़ा
एक बहन थी मेरी
हंसती थी,खिलखिलाती थी
मेरे बालो के संग खेला करती थी
मेरे संग वो पढ़ा करती थी
एक बहन थी मेरी
अब राखी का उसे कोई मोल नहीं
मुझसे उसका कोई मेलजोल नहीं
अब वो नहीं
अब मैं भी नहीं
रिस्तो का क्या है
एक धागे के सहारे जुड़ जाता है
तोड़ दो टूट जाता है—–अभिषेक राजहंस

6 Comments

  1. arun kumar jha arun kumar jha 29/06/2017
  2. Shabnam Shabnam 29/06/2017
  3. Shabnam Shabnam 29/06/2017
  4. C.M. Sharma babucm 30/06/2017
  5. Kajalsoni 01/07/2017
  6. Madhu tiwari madhu tiwari 02/07/2017

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