जाने ऐसा क्यों

मेरी नयी कविता-
शीर्षक-जाने ऐसा क्यों
जाने ऐसा क्यों
बनता जा रहा इंसान
किस बात का है अभिमान
न अपमान की चिंता
न सम्मान खोने का डर
जाने कैसे रहता वो निडर
व्यर्थ की अभिलाषाओं के लिए
क्यों भटकता रहता दर-दर
नींद के लिए
वो डनलप के गद्दों को ढूंढ़ता
प्यास के लिए
वो बिसलेरी की बोतले ढूंढ़ता
सांस के लिए
ए० सी० की हवा ढूंढ़ता
ना वो रुकता
ना उसकी चाहते रूकती
चाहतो का क्या है
वो बेहिसाब बढती
न वो पूरी होती
न इंसान को इंसान रहने देती
जाने ऐसा क्यों
बनता जा रहा इन्सान
उस हिरण की भांति
जो खुद की खुशबू से रहता अनजान
जाने ऐसा क्यों
बनता जा रहा इंसान— अभिषेक राजहंस

5 Comments

  1. babucm babucm 29/06/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 29/06/2017
  3. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 29/06/2017
  4. arun kumar jha arun kumar jha 29/06/2017
  5. Kajalsoni 01/07/2017

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