जीवन पर अधिकार किसका ? (कविता)

तुम्हारे ही जीवन पर है अधिकार किसका ?
तुम्हारा ? बिलकुल नहीं.
तुम प्रयास करो सज्जन बनकर जहाँ में
प्यार व् करुणा बाँटने का.
सावधान ! तुम्हारे सर पर कोई ,
खंजर लेकर खड़ा है.
तुम यदि चाहो जीवन में ऊँचा उठने को,
कामयाबी पाने को ,
देखो ! तुम्हारी राहों में कोई कांटे बिछा के बैठा है.
किस भरोसे तुमने घर के दरवाज़े बंद नहीं किये ?
यह कोई राम राज्य नहीं.
एहसास तुम्हें तभी होगा की कोई ,
धन व् साजो-सामान तो छोड़ो ,
तुम्हारे घर की इज्ज़त कोई पिशाच लूट
के ले गया.
अपनी बर्बादी से टूटे हुए ,थके हुए ,
रोते-बिलखते कोई कन्धा जब तुम तलाश करो ,
पहले तो वोह मिलेगा ही नहीं.
और यदि मिला भी तो मालूम होगा ,
वोह किसी अपने रुपी शत्रु का है.
तुम नींद से जागो मित्र !
इस दुनिया में तुम्हारा कुछ भी नहीं ,कोई भी नहीं.
यह खुनी,दरिन्दों ,नर -पिशाचों ,मानव रुपी भेडियों की दुनिया है.
तुम्हारी नहीं.
जब यहाँ तुम्हारी और तुम्हारे प्यारों का जीवन सुरक्षित नहीं.
तो यह जीवन तुम्हारा कैसे है?

7 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 26/06/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 26/06/2017
  3. arun kumar jha arun kumar jha 26/06/2017
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/06/2017
  5. babucm babucm 26/06/2017
  6. Kajalsoni 28/06/2017
  7. Om Parkash Sharma 26/07/2017

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