अंतिम अनुभव

 

उम्र के अंतिम पड़ाव पर

सुध बुध भी खो गयी

बंद कमरे में एक छोटी सी खिड़की

मेरी सारी दुनिया हो गयी

जो मुझे साँझ और सवेरे

से परिचित करवाती थी

झरोखे से आती सूरज की रौशनी

सिर्फ एक कोने तक आती थी

ये जर्जर शरीर अपनी ही हडियों का

बोझ भी नहीं उठा पाता था

तन्हाई अब सिर्फ साथी थी अपनी

इसी से अपने दिल को बहलाता था

जिंदगी का सफर जब शुरू हुआ था

तब साथ में इक मेला था

मगर अब परिवार के बीच भी

मैं बिलकुल अकेला था

मुठी भर दवाइयां ही

अब आगे की सच्ची साथी थी

अंतिम अनुभव में ये सीखा

कि ये ही अंत तक साथ निभाती थी

अगली सुबह ऐसा लगा जैसे

मैं हवा में उड़ रहा था

मेरा शरीर अंतिम सफर के लिए

चार कन्धों पर आगे बढ़ रहा था

उस टूटे हुए पिंजरे से

अब पंछी आज़ाद हो चुका था

काफी इंतज़ार के बाद ही सही

इक नए सफर का आगाज़ हो चुका था

हितेश कुमार शर्मा

7 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/06/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 26/06/2017
  3. Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 26/06/2017
  4. arun kumar jha arun kumar jha 26/06/2017
  5. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 27/06/2017
  6. Kajalsoni 28/06/2017
  7. Hitesh Kumar Sharma Hitesh Kumar Sharma 28/06/2017

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