अब क्या सोचत मूढ़ नदाना

अब क्या सोचत मूढ़ नदाना।
हित सुत नारी ठामहि रहिहै, धन-संपत के कौन ठिकाना ।।
माया मोह के जाल पसार्यो, बेरि पयानक क्या पछताना ।।
वास आपनो इतहि बँधायो, नात लगायो विविध विधाना ।।
दूत बुलावन आये द्वारा, मोह विवश भै माथ ठठाना ।।
काह करों कछु सक नहिं मेरे, सुध-बुध यहि अवसर बिसराना ।।
जॉन अधम कर जोरे टेरत, नाथ दिखावहु प्रेम अपाना ।।

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