सोच-अरूण कुमार झा बिट्टू

मत सोच की तू कमजोर हैं प्यारे
हैं निर्बल नही ,तू जग का वीर
हॉ सोचेगा मैं निर्बल हूं तो
हो जाएगा निर्बल और दीन

अपनी भुजा से मसल कर रख दें
वक्त के हर दर्द और पीर
तेरे पास हैं कर्म की शक्ती
इस शक्ती से ले तू सब कुछ जीत

मत कर तू किस्मत की बाते
ये बाते करते निर्बल और हीन
कर्मी हठी छीन लेते हैं
अपने हक किस्मत से भी

निर्धारित कर लक्छ्य तू अपना
उसमे ही ले खुद को सींच
रोम रोम भिगां दे उसमे
कोई लक्छ्य नही जो,न पाए तू जीत

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