पतंगे की आहुति – अनु महेश्वरी

एक बार एक गधे को, हुई ईर्ष्या,
देख खातिरदारी बकरे की ज्यादा,
सोचा उसने मॉल ढोता ‘मै’ बेचारा,
मुफ्त में मौज लूट रहा, बकरा सारा|

हारकर उसने बकरे से कह ही दिया,
क्या तक़दीर मिली है तुझे मेरे भाई,
न काम न मेहनत, फिर भी खा रहे हो मलाई,
बकरे ने जवाब में, कुछ ऐसा तब उसे बताया,
सुन, गधे का मुँह, खुला का खुला ही, रह गया|

कहना था बकरे का, मत हो तू उदास,
यह ‘आदमी’ न तेरा है न मेरा है, खास,
यह तो बस अपने स्वार्थ का ही है मारा,
खिला पीला तगड़ा कर रहा, खुद के लिए ही,
न जाने कब मुझे विदा करदे, इस दुनिया से ही|

जगमगाई दुनिया देख औरो की,
मत खा जाना धोखा कभी यहाँ,
अक्सर जलती हुई शमा में ही,
पतंगे की आहुति होती है जहाँ|

 

अनु महेश्वरी
चेन्नई

18 Comments

    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 23/06/2017
  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/06/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 23/06/2017
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 22/06/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 23/06/2017
  3. Dileep Kumar 22/06/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 23/06/2017
  4. SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 22/06/2017
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  5. babucm babucm 23/06/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 23/06/2017
  6. arun kumar jha arun kumar jha 23/06/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 23/06/2017
  7. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 23/06/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 24/06/2017
  8. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/06/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 24/06/2017

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