ज़िन्दगी हमें झकझोरती रही

ज़िन्दगी हमें झकझोरती रही,
फ़िक्र के फन्दों में उलझाती रही।
सुन-अनसुने हालातों में डूबा,
जो हमें डुबाते ही गये।
किस्तियाँ भी बनीं जले बांसों की;
और समंदर में कहाँ पानी था?,
फ़िर भी हिचकोले लगाती रही।
फ़टते रहे ज़्वार-भाटे जाने कितने?,
और हमें बुलबुलों में समा गयीं ।
आँखों में अश्कों का दरिया था,
जो हमेंशा उफनती ही रही।
सर्वेश कुमार मारुत

8 Comments

  1. babucm babucm 21/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 21/06/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 21/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 21/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 21/06/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 21/06/2017