मन – धीरेन्द्र ‘प्रखर’

अपनी पड़ी मन को अपनी पड़ी
सपने दिखा कर है अब भी खड़ी
इक पल न ठहरे, है मुश्किल बड़ी
अपनी पड़ी मन को अपनी पड़ी |

इस पल यहाँ तो है उस पल वहाँ
बिन पूछे चल दे, जी चाहे जहाँ
गायब सी रहती है, चंचल बड़ी
अपनी पड़ी मन को अपनी पड़ी |

चाहत है देने की खुशियाँ मगर
दे जाती हर वक़्त मुश्किल डगर
माया से इसकी है जमती बड़ी
अपनी पड़ी मन को अपनी पड़ी |

अब थम भी जाओ, हुई देर है
सुनो बात मेरी, समर शेष है
रुको केंद्र में, है ये अनुपम घडी
जरा साँस ले लो हो जाओ खड़ी |

-धीरेन्द्र ‘प्रखर’

4 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 19/06/2017
  2. babucm babucm 20/06/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 20/06/2017

Leave a Reply