सहमी सहमी उसकी आँखें
तनहा कबसे बैठी हैं
ना तूने पूछा उनका दर्द
न वो खुदसे कुछ कहती हैं
हाथ पकड़ कर उसका तूने
जख्म बस दिया है
थरथराते लबों को खुलने से पहले ही
उसने सिल दिया है

कब तक चुप्पी रखेगी
क्यों बेजुबान बन कर बैठी है
गुनाह आज तेरा भी है
जो इस दलदल में जा रही है

खोल दे इन बंधन को
एक उड़ान की कोशिश तोह कर
खुद का ना सही उस खुदा का मान तोह कर
हर कतरा परख कर तेरी मूरत उसने बनाई है
इस दुनिया को अपनी कला तुझमें दिखाई है

सहनशील सी तेरी काया
तुझ में इश्वर का रूप है पाया
कभी उस नन्ही जान की जननी बन कर
कभी बन कर उस साथी का साया
हर कदम पर तूने अब तक अपना फर्ज है निभाया
पर इस जहान ने बस तुझे निचे ही गिराया

आज हो कर मजबूर तेरे अधर्मों से
एक स्त्री ने अपना सवाल है उठाया
क्यों मुझपे बिना मेरी मर्जी के
तूने अपना हक है जताया
मेरे जिस्म को तोह चख लिया
क्या कभी मेरी रूह को भी समझ पाया?
दे जवाब मेरे सवालों का
आज मेरा है वक़्त आया
चुप होकर मैंने इस संसार से
बस दर्द है पाया
बस दर्द है पाया….

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  1. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 15/06/2017

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