प्रेम मंदिर – मनुराज वार्ष्णेय

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मैं प्रेम पुजारी दिल के मंदिर का सिर्फ तेरे ही गुनगान मैं गाऊँ
पत्थर की मूरत, मूरत में सूरत, सूरत पे तेरी मर मिट जाऊं
मैं प्रेम पुष्प के रस को लेकर तेरे तन को स्नान कराऊँ
तुम प्रिय प्राण को पाकर के अपने मन में अभिमान जगाऊँ
मैं प्रेमाग्नि की लौ लेकर दिन रात मैं तेरी आरती करूँ
अद्वितीय तेरी छवि निहारू और बार बार नैनों में भरूँ
मैं अकिंचन कुछ न मुझ पर किसका मैं तेरा भोग लगाऊँ
सब कुछ समर्पण है तुझको किस भाँति का मैं जोग गाऊँ
नैनो से नीर निकलता है कैसे सूखी मैं सेज बिछाऊँ
तू मेरा ही बनकर रह जाए कैसी तुझको मैं लोरी गाऊँ

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

8 Comments

  1. Ram Gopal Sankhla Ram Gopal Sankhla 14/06/2017
  2. C.M. Sharma babucm 14/06/2017
  3. Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 14/06/2017
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/06/2017
  5. SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 14/06/2017
  6. Kajalsoni 14/06/2017
  7. Madhu tiwari Madhu tiwari 14/06/2017
  8. arun kumar jha arun kumar jha 15/06/2017

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