धरा का तु श्रृंगार किया है रे !

तू धीर, वीर ,गंभीर सदा
जीवन को उच्च जिया है रे,
तु दुःखियों को सींचित् कर श्रुति स्नेह से
कैसा ,ह्रदय रक्षण किया है रे !
तु भाग्य विधाता से हरदम
उन्नत ,मधुर विचार पाया है रे,
तु वीरों के अन्तःस्थल को,
प्रफुल्लित कर प्यार भरा है रे !
तु वंचितों,पददलितों के हित,
सदा कष्टों का भार ढहा है रे,
तु स्वाभिमानी,मातृभूमी हित,
गर्दन पर तलवार सहा है रे !
तु पराधिनता में जगत्-जननी को,
अहा! कैसा धार दिया है रे;
लाखों मस्तक कर अर्पित चरणों में,
अद्भुद् श्रृंगार किया है रे !
अद्भुद् श्रृंगार किया है रे !

अखंड भारत अमर रहे !

©

कवि आलोक पाण्डेय
(वाराणसी)

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/06/2017
  2. SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 13/06/2017
  3. babucm babucm 13/06/2017
  4. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 13/06/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 13/06/2017

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