आवारा भटकता फ़िर रहा हूँ

आवारा भटकता फिर रहा हूँ मैं,
जाने क्यों उनकी यादों में।
इस तरह यह ज़ीवन आधा गुजारा ,
आरज़ू भी करते हैं ,फरियाद करते हैं।
मैं हूँ एक ऐसा बेचारा !
इस जहाँ में अकेले पड़ गये हैं,
न कोई मेरा सहारा ।
चाह कर तो रह गये उनको,
पर उस समय था मैं एक बन्जारा।
दोस्त तो मिले थे बहुत हमको,
पर ख़ुद को ख़ुद से कर लिया किनारा।
रास्ते तो बदले ही बदले ,
और बदल डाला अपना हाला।
पर हम जहाँ भी गये,
हम रह गये आवारा,आवारा,आवारा ……………..!
सर्वेश कुमार मारुत