ग़ज़ल सी हवाओं में उड़ेगी…

ग़ज़ल सी हवाओं में उड़ेगी…

 

फिर से कोई ख़्वाब है जो दिल में मर रहा

फिर से कोई ग़ज़ल सी हवाओं में उड़ेगी

 

फिर अश्क़ कोई आज इन आँखों से गिरेगा

फिर आह धुआं होगी फ़िज़ाओं में घुलेगी

 

हर दर पे सदा दे रहा हूँ इस यकीन से

कहीं तो मेरे नाम की खिड़की भी खुलेगी

 

बुझ चुकी चिताओं को मै छेड़ता हूँ सोचकर

की कहीं तो दबी राख में चिंगारी मिलेगी

 

सुन’ना कभी गौर से तुम मेरी हँसी को

बीच में दबी कोई सिसकारी मिलेगी

 

इतना भी नहीं उजड़ा है अब तक मेरा ये दिल

मुरझाए हुए अरमानों की एक क्यारी मिलेगी

 

कितने ही सलीके से लिखा है तुझे हर लफ्ज़ में

मेरे दामन में तेरी फुलकारी मिलेगी

 

ज़िंदगी से अब तलक हारा नहीं हूँ मै कहीं

साँसों में मेरी जंग सी इक जारी मिलेगी

 

क़र्ज़ अब तक जिंदगी का कोई चुका पाया नहीं

बाकी सभी के अंदर उधारी सी मिलेगी

 

हम जीत तो सकते हैं ज़माने से मगर सच

अपनों से कोई हार करारी सी मिलेगी

 

11 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/06/2017
    • shaurya mishra shaurya mishra 12/06/2017
  2. Chandra shekhar 06/06/2017
  3. Rishikesh Kumar 06/06/2017
  4. Madhu tiwari madhu tiwari 06/06/2017
    • shaurya mishra shaurya mishra 07/06/2017
    • shaurya mishra shaurya mishra 12/06/2017
  5. C.M. Sharma babucm 06/06/2017
  6. Kajalsoni 07/06/2017
  7. Kajalsoni 07/06/2017
    • shaurya mishra shaurya mishra 12/06/2017

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