मेरी ही कविताओं ने आज खिलाफत छेड़ दी

मेरी ही कविताओं ने आज खिलाफत छेड़ दी
मेरे ही सामने खड़ी हो गईं तन कर,
सवाल करती हैं
पूछती हैं वो अनुभव किसका था
जिसमें तुमने हमें डुबोया,
पूछती हैं मेरी ही कविताएं
कि वो तर्जबा किसका था जिसे तुमने मुझमें उतारा।
मेरी ही कविताएं आज खिलाफ में खड़ी हैं-
कहती हैं वो हवाएं,
वो तंज़ करती बातें
कहां से लाए थे
कहां से लाए थे
वे एहसासात
जिसमें सिसकियां थीं,
वो तडपन थी,
वो किसका था।
मेरी ही कविताएं आज खड़ी हैं-
मेरे ही बरक्स
सवाल करती हैं
कि वो घटनाएं किसकी थीं
जिसे तुमने अपने नाम कर लिया,
वो बातें किसकी थीं
जिसमें हमें डूबोया,
बता तो ज़रा
वो तोहमत किसकी थी
जो हम पर मढ़ा।
मेरी ही खिलाफ़त पर उतारू
कविताएं
साक्ष्य मांगती हैं
कि वो किनकी हैं
जो लिखे हैं
ख़ाली पन्नों पर
जिनपर आज सवाल उठते हैं।

10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/06/2017
  2. Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 06/06/2017
  3. Kajalsoni 06/06/2017
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/06/2017
  5. C.M. Sharma babucm 06/06/2017
  6. Madhu tiwari madhu tiwari 06/06/2017
  7. Madhu tiwari madhu tiwari 07/06/2017
  8. kprapanna 07/06/2017
  9. Lalitya lalit 07/06/2017
    • kprapanna 07/06/2017

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