चाहतें

चाहतें तो बहुत होती हैं,
कुछ छोटी-कुछ बड़ी, होती हैं।
कुछ माँगने से मिल जाती हैं,
कुछ बिन माँगे पूरी हो जाती हैं।
चाहतों की लड़ी लम्बी होती है,
माँगने वालो की उम्र ज़रा होती है।
कुछ कहते-कहते रह जाते हैं,
और ग़मों को ज़िगर में छिपाते हैं।
कुछ मसमसा कर रह जाते हैं,
और अपनी ज़िन्दगी से कतराते हैं।
वे इनको अपना ज़ाम बना लेते हैं,
ग़मों का प्याला घूँट-घूँट कर पीते हैं।
पर चाहते क्या जाने दर्द अपना?,
पता नहीं किनकी शहर होती हैं।
पर सबको बता देती हैं,
सिर्फ़ कर लो कर्म अपना।
यह न किसी की दोस्त ,
और न सहेली होतीं हैं।
सर्वेश कुमार मारुत