अंतस मन – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

 

 

अश्क बहुत दूर की याद दिलाती है

खुद तड़पती हुई गालों पर आती है।

दो अखियॉ सुख-दुःख की सागर है

ममता और प्यार से भरी गागर है।

मन सागर में ही खोया है

जो अंतस मन में बोया है।

वह सागर अश्क वहा करके

मन का ही मैल धो देती है।

जो छुपी रहती है चित्मन में

वह आकर खुद रो लेती है।

वह बहुत करीब से आती है

मन को जैसे छू जाती है।

कोई रोता है कुछ खो करके

कोई पाकर रोता रहता है।

कोई मजबूरी में रोते हैं

कोई भय से रोया करता है।

कभी अश्क निकलकर बहती है

कभी ऑखों में सुख जाती है।

यह धैर्य-धैर्य की बात है

जो सांसो में रूक जाती है।

 

बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

16 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 31/05/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 01/06/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 31/05/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 01/06/2017
  3. arun kumar jha arun kumar jha 31/05/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 01/06/2017
  4. Kajalsoni 31/05/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 01/06/2017
  5. Madhu tiwari madhu tiwari 01/06/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 01/06/2017
  6. shivdutt 01/06/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 01/06/2017
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 05/06/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 02/06/2017
  7. babucm babucm 05/06/2017

Leave a Reply