|| मेरी आस्था ॥

अयोध्या की धरती अति पावन, जहॉ प्रभु का होता आभास ।
कण कण में बसती स्मृति प्रभु की, राम राम जपती है श्वास ॥ 1 ॥
जन्म भूमि यह श्री राम की , तीन भाइयों संग लिया अवतार ।
दुष्टों से धरा को किया मुक्त, शापित जनों को दिया तार ॥ 2 ॥
हनुमान गढ़ी और जन्म भूमि में मस्तक सबके झुकते हैं ।
कनक भवन सरजू की धारा, मोहित सबको करते हैं ॥ 3 ॥
युगों युगों से पूजित धरती, जिसकी धूलि में खेले राम ।
शीश न कैसे नतमस्तक हो, जहॉ गूंजता प्रभु का नाम ॥ 4 ॥
आस्था की कोई व्याख्या नहीं, हृदय में होता इसका बास ।
किस ओर झुकाव हो जाये इसका, होता नहीं तनिक अहसास ॥ 5 ॥
जन्म जनमान्तर के संस्कारों से, मानव मन में लेती जन्म ।
सबकी आस्था भिन्न-भिन्न, प्रारब्ध बनाते संचित कर्म ॥ 6 ॥
किसी की आस्था है भूतों में, तो प्रेत किसी को प्रिय होते ।
कोई पूजता असुरों को, तो पितर किसी के पूज्य होते ॥ 7 ॥
कोई शिव में ध्यान लगाता, कोई शक्ति प्राप्ति को करता जाप ।
किसी के आराध्य बृह्मदेव हैं, कोई नारायण का करता जाप ॥ 8 ॥
आस्था नितांत ‘व्यक्तिगत’ होती, परिवर्तन न इसे स्वीकार ।
किसी की आस्था परिवर्तित करने का, होता ना कदापि अधिकार ॥ 9 ॥
विश्व के समस्त धर्मों की आस्थाओं के होते, रूप भिन्न ।
किंतु इसका वास हृदय में होता, यह सत्य सदा होता अभिन्न ॥ 10 ॥
मेरी आस्था है अयोध्या में है, जन्म भूमि मेरे प्रभु की ।
जिस धरती पर खेले राम लला, जो प्रिय है भारत के जन-जन की ॥ 11 ॥
गीता में प्रभु कहते, सारे धर्मों का करो त्याग ।
मेरी शरण में आ जाओ, पा जाओगे मुक्ति का मार्ग ॥ 12 ॥
जो वाणी प्रभु राम की, वही हैं कृष्ण के उद्गार ।
दोनों को एकरूप जानकर, शीश झुकाता प्रभु के द्धार ॥ 13 ॥
मेरी आस्था है अयोध्या में, जहॉ राम ने जन्म लिया ।
अनेकों लीलाएं कीं, कर्तव्य पथ को पूर्ण किया ॥ 14 ॥
सबकी आस्थाओं को कर प्रणाम, अयोध्या को शीश झुकाता हूँ ।
मेरे प्रभु की जन्म स्थली, मस्तक पर धूलि लगाता हूँ ॥ 15 ॥

अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव

7 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 31/05/2017
  2. अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव 31/05/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 31/05/2017
  4. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 31/05/2017
  5. Kajalsoni 31/05/2017
  6. अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव 31/05/2017

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