मन की गहराई – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

 

मन अशांत
अशांत मन में
प्रसांत महासागर।
शांत मन में समुद्र का जमावड़ा
सात समंदर
एक विशालतम भुगोल के परिदृश्य
जल का महाप्रलयंकारी स्वरूप।
मन की परिभाषा
उसके परिच्छेद
उसके बहुत तेज गति
इसके मति से मिलते जुलते समंदर।
मन की गहराईयॉ
क्या कम है समंदर से
कल्पनाये भी ऐसी
पलक झपकते लोक परलोक
सबकी खबर।
जिसने देखा तक नहीं
सब कुछ हाजिर है
बिलकुल सामने नजर के
जादुई ताकत की तरह
हजारों जन्मों के ख्याल
भरे पड़े है मन के दिमाग में।
बनाई है जिसने धरती-आकाश
जल-अग्नि और वहती हुई हवा
एक परिधिनुमा ब्राहाण्ड।
उसके गोद में घूमते
सूर्य-तारे-चादॅ जैसे कई और
आदि से अंत
सब जुडें है चैन की तरह
न टूटने वाला रात और दिन
कभी खत्म न होने वाला
एक शिलशिला।
एक कडवा अनूठा सच
आत्मा
ईश्वर और उसके पॉच तत्व
सभी अमर है।
समंदर की तरह
उसके कुण्डली में अमृत
उसके गहराईयों में फैला विष
रत्नों के भंडार से भरा गोद
संसार में सब कुछ है।
लुभाने और पाने के लिए
जी भरकर खाने के लिए
देखने और दिखाने के लिए।
हमारा कुछ नहीं
कुछ भी नहीं
कर्म करो
अपने कर्मो से प्रधान बनो
सत्यमेव जयते ।।

 

बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

12 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 30/05/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 31/05/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 30/05/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 31/05/2017
  3. Madhu tiwari madhu tiwari 30/05/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 31/05/2017
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/05/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 31/05/2017
  5. Kajalsoni 31/05/2017
  6. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 31/05/2017
    • Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 31/05/2017
  7. Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 31/05/2017

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