हे प्रभु, तुम मेरे गीत न गावो —- भूपेंद्र कुमार दवे

हे प्रभु, तुम मेरे गीत न गावो

 

है सन्नाटा चहूं और अब

चुप चुप है कोलाहल भी

सहमे सहमे वाद्यवृंद हैं

टूट चुकी है पायल भी

करुण स्वरों का राज हुआ है

बिखरे सुर हैं घायल भी

सब आँखों में लरज रहे हैं

सावन के कुछ बादल भी

अब न खिलेगी धूप कहीं भी

 

चाहे तुम कितना भी गावो

पर तुम मेरे गीत न गावो

 

डाल डाल पर रेंग रहा है

विषधर जैसा पतझर भी

शाख शाख पर लिखा हुआ है

पीड़ा का हर अक्षर भी

छिपा हुआ है नीड़ नीड़ में

घायल हो हर नभचर भी

काँप रहा आँसू अनजाना

सब पलकों के अंदर भी

अब न मिलेगी महक कहीं भी

 

चाहे तुम कितना भी गावो

पर तुम मेरे गीत न गावो

 

दौड़ रहा है रुधिर शिरा में

डरा हुआ भय कण कण में

जूझ रहा है हर मानव भी

अपने मन की उलझन में

बरस रही है कुंठा जैसे

मानस के अंतरमन में

चमक रही है चंचल चिंता

चिनगारी-सी चिंतन में

शीतल धारा अब न बहेगी

 

चाहे तुम कितना भी गावो

पर तुम मेरे गीत प गावो

 

हैं पथ पर पीड़ा के पत्थर

और फफोले पग में भी

पथ पर चलने को आतुर हैं

टूटी-सी बैसाखी भी

गिरकर फिर उठने की क्षमता

खो बैठीं हैं साँसें भी

काँधे काँधे कब तक चलता

है भारी यह ठठरी भी

अब मंजिल दिखे ना कभी भी

 

चाहे तुम कितना भी गावो

पर तुम मेरे गीत न गावो।

—-      ——-     —-      भूपेंद्र कुमार दवे

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10 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 23/05/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 23/05/2017
  3. कृष्ण सैनी कृष्ण सैनी 23/05/2017
  4. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 23/05/2017
  5. SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 23/05/2017
  6. SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 23/05/2017
  7. C.M. Sharma babucm 24/05/2017
  8. Kajalsoni 24/05/2017
  9. Madhu tiwari Madhu tiwari 24/05/2017

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