वाह रे इंसान-Raquim Ali

…भाग -१…

वाह रे इंसान
कहां पहाड़-समंदर-गहरी खान
छोटा-सा कद, पर लेता है सबको छान
आकाश छू लेने का पाले रहता अरमान!

प्रतिफल है उसकी प्रबल इच्छा-शक्ति का
दुनिया भर का हर अद्भुत-नया साज-सामान
तल्लीन-तपस्वी-तत्पर है, मेहनतकश है वह
बढ़ाता है नित सुविधाएँ व मानवता का ज्ञान।

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…भाग-२…

वाह रे इंसान
चंचलयुक्त -चतुर है, स्थिर नहीं उसका ध्यान
माल मिले जग भर का लगाता है दावं पर दावं
युक्ति लगाता है, मिले अपरमित मान- सम्मान।

कुछ ही को छोड़, नहीं चाहता हर इंसान-
‘सुखी-सम्पन्न रहें सब, सबका हो कल्याण
सभी हैं एक, हिंदू, सिख, इसाई, मुसलमान
सबका, मालिक सर्वशक्तिमान एक भगवान।’

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भाग-३

वाह रे इंसान
भूख दो रोटी की
कितना परेशान!

काम ही काम
सुबह से भाग-दौड़
हो जाती शाम।

अभी नहीं आराम
नमक-तेल है लाना
बीवी का फरमान।

सुबह का बचपन
दोपहर की जवानी
शाम बुढ़ापे की कहानी!

…र.अ. bsnl in

10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/05/2017
  2. raquimali raquimali 16/05/2017
  3. Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 16/05/2017
  4. vijay kumar singh 16/05/2017
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 16/05/2017
  6. raquimali raquimali 16/05/2017
  7. babucm babucm 16/05/2017
  8. raquimali raquimali 16/05/2017
  9. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 17/05/2017
  10. raquimali raquimali 17/05/2017

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