फिर जीना सीख रही हूँ

फिर जीना सीख रही हूँ..

जब मर्ज़ी हसना जब मर्ज़ी रोना,
बिना कुछ कहे, अपने में ही खोये रहना
न कोई दिखावा, न कोई छलावा
सिर्फ एक चेहरा बिना कोई नकाब।

न कोई चिंता, न कोई डर
तुझे बस उन्मुक्त रखना है अपना स्वर।
जानती है तू बस दो ही रास,
वात्सल्य और हास्य।

माँ बनकर जाना मैंने
कितना बदल गयी मैं ,
मैं भी तो ऐसी ही थी जब आयी थी इस संसार में,
बिलकुल ऐसी ही,
अब क्या हुआ मुझे,
मेरा अस्तित्व मानों खो सा गया,
हज़ारो सेकड़ो नकाबों के पीछे,
बस यही कुछ पच्चीस – सताईस बरसो में।

अभिव्यक्त हो प्रत्येक अनुभूति अब
अभिलाषा ऐसी करती हूँ,
मैं फिर वही बन जाऊ,
दिल में जिंदादिली लिए
नज़रो में लिए ख्वाब,
ख़ुशी हो या हो गम
हर लम्हे को जी जाऊ,
फिर जीना सीख जाऊ।

10 Comments

  1. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 14/05/2017
    • Sujata Sujata 16/05/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/05/2017
    • Sujata Sujata 16/05/2017
  3. C.M. Sharma babucm 15/05/2017
    • Sujata Sujata 16/05/2017
    • Sujata Sujata 16/05/2017
  4. Ketki sawant 16/05/2017
    • Sujata Sujata 16/05/2017

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