“सब्र”- – दुर्गेश मिश्रा


आज टूटा सब्र तो यू ना रुक पायेगा,
क्रोध से उत्पन होगा,प्रलय निश्चित आएगा
चीरते हुए सनाते को इक युग यू ही बदल जायेगा
आज टूटा बाँध तो फिर बंध ना पायेगा

की आज टुटा सब्र तो …..

क्या है! प्रदर्शन शक्ति का?
वक़्त ये अनुकूल है ?
शब्द तीखे है बाढ़ से भी,
ये किस युद्ध का रूप है?

शोध मुझ पर करलो जरा
धरा भी विचलित हो जाएगी,
मत छेड़ो वनराज को
रूह तुम्हारी कप-कपा जाएगी

शांत हुँ तो शीत
ग्रीष्म है तो सिंह,
गर्जना अद्भुत होगी प्रतिज्ञाएँ रुपी भीष्म.
की आज टूटा सब्र तो परलय बन जायेगा…
आज टूटा सब्र तो यू ना रुक पायेगा …यु ना रुक पायेगा….

3 Comments

  1. arun kumar jha arun kumar jha 13/05/2017
  2. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 13/05/2017

Leave a Reply