“पुनरागमन” – दुर्गेश मिश्रा

क्यूँ डूब रहा मन का सूरज
क्यूँ रूठ रही अंतर वाणी
क्यूँ याद आ रहा वो धुंधला पल
जिस पर गिर चुकी काली स्याही …
क्यूँ डूब रहा मन का सूरज ||
अतीत के पन्नो में सिमटी स्मृतियों की ऐसी कुंजी
मायूस कर गयी फिरसे हरी डाली की सुखी पत्ती
क्यूँ डूब रहा मन का सूरज ||
खेलने आई एहसासों से पीड़ाओं की गहरी खाई,
लौट रहा पल वर्तमान में झिलमिल जिसकी परछाई,
क्यूँ डूब रहा मन का सूरज ||
मिट्टी होती सब तरकीबे तूफ़ान उठा ले आई है,
बिंदु जोड़कर दृश्य दिखाने ओझिल सपनो भरी नींद ये गहरी लाई है,
क्यूँ डूब रहा मन का सूरज ||

2 Comments

  1. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 13/05/2017
  2. C.M. Sharma babucm 15/05/2017

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