काम आखि़र जज्बा-ए-बेइख्तियार आ ही गया

काम आख़िर जज़्बा-ए-बेइख़्तियार[1] आ ही गया
दिल कुछ इस सूरत तड़पा उनको प्यार आ ही गया

जब निगाहें उठ गईं अल्लाह री मे’राजे-शौक़[2]
देखता क्या हूँ वो जाने-इन्तिज़ार[3] आ ही गया

हाय ये हुस्न-ए-तस्व्वुर का फ़रेब-ए-रंग-ओ-बू
मैंने समझा जैसे वो जाने बहार आ ही गया

हाँ, सज़ा दे ऎ खु़दा-ए-इश्क़ ऎ तौफ़ीक़-ए-ग़म
फिर ज़ुबान-ए-बेअदब पर ज़िक्र-ए-यार आ ही गया

इस तरहा हूँ किसी के वादा-ए-फ़रदा[4] पे मैं
दर हक़ीक़त जैसे मुझको ऐतबार आ ही गया

हाय, काफ़िर दिल की ये काफ़िर जुनूँ अंगेज़ियाँ[5]
तुमको प्यार आए न आए, मुझको प्यार आ ही गया

जान ही दे दी ` जिगर’ ने आज पा-ए-यार[6] पर
उम्र भर की बेक़रारी को क़रार आ ही गया

शब्दार्थ:

  1. ↑ विवशता की भावना
  2. ↑ इश्क़ की चरम सीमा
  3. ↑ प्रतीक्षा का प्राण अर्थात प्रेयसी
  4. ↑ आने वाले कल के वादे पर
  5. ↑ उन्माद पूर्ण हरकतें
  6. ↑ प्रेयसी के क़दमों

Leave a Reply