मृदु चुम्बन – मनुराज वार्ष्णेय

मंजर कैसा था वो मेरा जिससे जीवन पावन हो गया
उसकी आँखों में आँखें डाल मैं मुर्ख सा बन खो गया
प्यासे थे जो होठ मेरे फिर उनकी सारी तलब मिट गयी
संयोग हुआ जो होठों का फिर वो मृदु चुम्बन हो गया

 

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/05/2017
  2. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 08/05/2017

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