अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इंसान के बस का काम नहीं

अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इन्सान के बस का काम नहीं
फ़ैज़ाने-मोहब्बत[1] आम सही, इर्फ़ाने-मोहब्बत[2] आम नहीं

ये तूने कहा क्या ऐ नादाँ फ़ैयाज़ी-ए-क़ुदरत[3] आम नहीं
तू फ़िक्रो-नज़र [4]तो पैदाकर, क्या चीज़ है जो इनआम[5] नहीं

यारब ये मुकामे-इश्क़ है क्या गो दीदा-ओ-दिल [6]नाकाम नहीं
तस्कीन[7] है और तस्कीन नहीं आराम है और आराम नहीं

आना है जो बज़्मे-जानाँ[8] में पिन्दारे-ख़ुदी[9] को तोड़ के आ
ऐ होशो-ख़िरद के दीवाने याँ होशो-ख़िरद[10] का काम नहीं

इश्क़ और गवारा ख़ुद कर ले बेशर्त शिकस्ते-फ़ाश[11] अपनी
दिल की भी कुछ उनके साज़िश है तन्हा ये नज़र का काम नहीं

सब जिसको असीरी[12] कहते हैं वो तो है असीरी ही लेकिन
वो कौन-सी आज़ादी है जहाँ, जो आप ख़ुद अपना दाम[13] नहीं

शब्दार्थ:

  1. ↑ प्रेम की उदारता
  2. ↑ प्रेम की पहचान
  3. ↑ प्रकृति की उदारता
  4. ↑ चिंतन और परख
  5. ↑ पुरस्कार
  6. ↑ आँखें और दिल
  7. ↑ चैन
  8. ↑ प्रेयसी की महफ़िल
  9. ↑ अहंकार
  10. ↑ बुद्धि ,अक़्ल
  11. ↑ पराजय
  12. ↑ क़ैद
  13. ↑ जाल

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