वर्क उड़ने लगे

वर्क उड़ने लगे

किताब ज़िंदगी की खोली ही थी

कि वर्क उसके उड़ने लगे

छा गई बाहर कुछ ऐसी

की फिर हम सभलने  लगे

खट्टे मीठे पलों की

यादें उभर रहीं थी

बीते पलों में जैसे बहकने लगे

था हर नज़ारा चलचित्र हो जैसे

कभी हम डूबने कभी उभरने लगे

टकरा के ख़ामोशियों से कभी

मायूसीयों में घिरने लगे

यूँ भी हुआ कभी

मीठी यादों में खो

हम पिघलने लगे

जीवन तो है इक कहानी की  तरह

जाने कियूँ शब्द आज मचलने लगे

कई बहारें ख़ुशियों से  भर गयीं दामन

कुछ उड्डा ले गयीं चैन  मन   का

ठिट्टकते  हुए क़दमों से चले जा रहे थे

कुछ आयी  बन के आँधी

और उड्डा गयीं होश दिल का

सोचती हूँ बहुत

वजह समझ पाती नहीं

क्या २ घट्ट गया

ना रहा ज़ोर तन  का

पहेली सी लगती है ज़िंदगी आज

समझ नहीं आता  शोर मन का

वर्क दर वर्क बदल जाते हैं चेहरे

कुछ छोड़ जाते हैं मीठी यादें

कुछ ले जाते हैं चैन दिल का

हर चेहरे के पीछे

छुपी है कोई कहानी

बदलते रहते  हैं किरदार

पर रह जाती  है निशानी

 

 

 

 

 

 

 

 

10 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 25/04/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 25/04/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 25/04/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 25/04/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/04/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 25/04/2017
  4. C.M. Sharma babucm 25/04/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 25/04/2017
  5. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 25/04/2017

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