छलकते नैन

अपने रूठते चले गए ,
सपने टूटते चले गए,
इसी जीवन की पहेली में ,
ये नैन छलकते चले गए ,

दर्द बढ़ते चले गए ,
दिल टूटता चला गया ,
न समझा पाए किसी को दिल की सच्चाई ,
बस ये नैन छलकते चले गए ,

सच को झूठ बनाते गए ,
झूठ से फासले बढ़ाते गए ,
कोई न देख सका
दिल की साफ़ नजरो को ,
तो. ये नैन छलकते चले गए .

लोग समाज बनाते गए ,
अपना-अपना कहते गए
स्वार्थ की नदिया बहाते गए ,
डूबते इस नदी में नावों को देखकर ,
बस ये नैन छलकते चले गए ..
                              बस ये नैन छलकते चले गए .

                                                                         

                                                                                   अंजली यादव

9 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 24/04/2017
  2. raquimali raquimali 24/04/2017
  3. mani mani 24/04/2017
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/04/2017
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 24/04/2017
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 24/04/2017
  7. Madhu tiwari Madhu tiwari 25/04/2017
  8. Kajalsoni 27/04/2017

Leave a Reply