इस जग में तो धन ही बल है

जिससे कूजित कलयुग कल -कल है
इस जग में तो धन ही बल है

जीवन-संचारी ये रक्त है
इसके बिन हर जीव मृतक है
वही स्थिति धन-हीन मनुज की
जल बिन यथा जल्द निर्जल है
इस जग में तो धन ही बल है

इसका लोभी बन कर मानव
हो जाता है निश्चय दानव
मानव को मानवता से च्युत
कर सकने में यही सबल है
इस जग में तो धन ही बल है

इसके हेतु सभी रिश्ते हैं
इस के खातिर सब बिक सकते हैं
कोई बली नहीं इस जैसा
इसके सम्मुख सब निर्बल हैं
इस जग में तो धन ही बल है

लक्ष्मी का यह अपर-रूप है
माया का यह अंध – कूप है
इससे निकल न सकता कोई
लोभ -मोह का यह दल-दल है
इस जग में तो धन ही बल है

बन बैठे इसके चेरे हम
नाचें सब जगती मरकट बन
कोई कर ही क्या सकता, जब
मानव-मन ही चंचल है
इस जग में तो धन ही बल है

12 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 24/04/2017
  2. raquimali raquimali 24/04/2017
    • Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' 26/04/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/04/2017
    • Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' 26/04/2017
    • Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' 26/04/2017
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 24/04/2017
    • Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' 26/04/2017
  5. Madhu tiwari Madhu tiwari 25/04/2017
    • Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' 26/04/2017
  6. Kajalsoni 27/04/2017

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