दबा ली वो ख्वाइशें भुला दिया अरमानों को

दबा ली वो ख्वाइशें भुला दिया अरमानों को
भायी नही थी जो मेरे अपने ही नादानों को

बदल दिए वो मार्ग सारे जो जाते थे सब तुम तक
अँधा किया अपने आप को बंद किया फिर कानों को

उपहार मिला था जो मुझको उस ज़िन्दगी ने भी ठुकरा दिया
कोई भी रस , आनंद न था फिर जगह मिली सिर्फ तानों को

रूह झुलसती गयी जिस्म थरथराता रहा
कैसे सहन करता ये तब रुख लिया मयखानों को

तू दूर हुई तू बिछुड़ गयी पर एक नफ़ा मैंने पायी है
शायर का काम दिलाया है आभार है उन मेहरबानों को

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

7 Comments

  1. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 22/04/2017
  2. C.M. Sharma babucm 23/04/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/04/2017
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 24/04/2017
  5. Madhu tiwari Madhu tiwari 25/04/2017

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