चमन के भौरों

चमन के भौरों

 

खिल गई फूल पहले कली थी

कली थी तो कितनी भली थी।

भौरों से दूर चमन में पली थी

बहारों के संग हवा में फली थी।

न कोइ गिला न शिकवा थी कोई

हंसती थी हरदम न रोया था कोई।

आज गम के सायां ने उनको है घेरा

दिखती नहीं अब कहीं पर भी बसेरा।

मेरे आबरू क्यों अब लुटने लगे हैं

रेहनुमा न कोई दम घुटने लगे हैं।

पंखुडी अब मेरे लगे चोट खाने

भौंरे तितलियॉ लगे नोच खाने।

बेवफा ये दुनिया दगा दे रही क्यों

वेमतलब मुझको सजा दे रही क्यों घ्

अरमान मेरे अब कुचलने लगे है

मनचले अब फिर मचलने लगे है।

चाहत में ये कैसी हंसी आ रही है

जमाने से क्यों ये फंसी आ रही है।

दुखाओं न दिल को नसिहत है मेरी

रौंदो न अरमान ये हकीकत है मेरी।

 

बी  पी  शर्मा   बिन्दु

 

8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/04/2017
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 30/04/2017
  2. C.M. Sharma babucm 22/04/2017
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 30/04/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 30/04/2017
  4. Kajalsoni 22/04/2017
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 30/04/2017

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