अंतस मन

अंतस मन

 

अश्क बहुत दूर की याद दिलाती है

खुद तड़पती हुई गालों पर आती है।

दो अखियॉ सुख-दुःख की सागर है

ममता और प्यार से भरी गागर है।

मन सागर में ही खोया है

जो अंतस मन में बोया है।

वह सागर अश्क वहा करके

मन का ही मैल धो देती है।

जो छुपी रहती है चित्मन में

वह आकर खुद रो लेती है।

वह बहुत करीब से आती है

मन को जैसे छू जाती है।

कोई रोता है कुछ खो करके

कोई पाकर रोता रहता है।

कोई मजबूरी में रोते हैं

कोई भय से रोया करता है।

कभी अश्क निकलकर बहती है

कभी ऑखों में सुख जाती है।

यह धैर्य-धैर्य की बात है

जो सांसो में रूक जाती है।

 

बी  पी  शर्मा   बिन्दु

 

8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/04/2017
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 30/04/2017
  2. babucm babucm 22/04/2017
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 30/04/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 30/04/2017
  4. Kajalsoni 22/04/2017
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 30/04/2017

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