तमस भरे अन्तर को मेरे

तमस भरे अन्तर को मेरे

 

असतो  मा सद् गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

मृत्योर्मामृतं    गमय

O Lord, Thou lead me

From untruth unto truth

From darkness unto light

From death unto divinity.

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तमस  भरे अन्तर  को मेरे

आलोकित  तुम  कर जावो।

औ असत्य की आग बुझाने

सत्य मेघ  तुम  बन जावो।

 

जग में भीड़ बहुत है फिर भी

कदम  सभी के  थके  हुए हैं

जो  चलते  हैं, गिर  पड़ते हैं

लाश  वहीं  पर  बने  पड़े हैं

 

राह हजारों  दिख  पड़ती हैं

दिशा नरक की दिखा रही है

पर  वह राह  कहाँ से पाऊँ

जो  तेरा  साथ  दिलाती  है

 

पा जाऊँ गर वह पथ तो तुम

पदचिन्हों   से   भर   जावो

और साथ  तुम  मेरे  चलकर

मुझ  में  साहस  भर  जावो

तमस  भरे  अन्तर  को  मेरे

आलोकित  तुम  कर  जावो।

 

चहूँओर  जो  कोलाहल  है

उसमें  पीड़ा  चीख  रही है

और  सुबकती साँसों में छिप

खामोशी खुद पे खीज रही है

 

नहीं  कहीं  है  गूँज  खुशी की

गीतों  के  सुर  भी  गुमसुम हैं

करूँ    प्रार्थना   तन्हाई    में

जहाँ  खिले बस शान्त कुसुम हैं

 

 

वसंत ऋतु-सा खिलूँ जगत में

जीवन   ऐसा   कर   जावो

मुरझाये  मन की  कलियों में

गंध  नयी  नित  भर  जावो

तमस  भरे  अन्तर  को मेरे

आलोकित  तुम   कर जावो।

 

हिंसा  के  ही पर  फैलाकर

उड़ते  फिरते  हैं मानव जन

जख्मों  की  बारात  सजाये

झूम रहे हैं व्याकुल तन मन

 

नहीं अलोकित कर पाती है

नन्हें  दीपक   की  बाती

आँधी तूफानों  में  घिरकर

नाव नहीं है तट पर जाती

 

व्यथित हृदय के कंपित सुर में

गीत   अनोखा   भर  जावो

और सुखद स्मृतियों का स्पंदन

हर  साँसों  में   भर  जावो

तमस   भरे  अन्तर  को मेरे

आलोकित  तुम   कर जावो।

            ——-     भूपेंद्र कुमार दवे

 

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4 Comments

  1. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 20/04/2017
  2. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 20/04/2017
  3. C.M. Sharma babucm 20/04/2017
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/04/2017

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