मेरी जिह्वा मधुर बनी हो

 मेरी जिह्वा मधुर बनी हो

 

जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम्

____अथर्ववेद –1-34-2

मेरी जिह्वा में मधुरता हो और जिह्वा के मूल अर्थात् मानस में मधुर रस का संनिवेश हो।

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मेरी जिह्वा मधुर बनी हो

और  मूल में  मधुरस हो

वाणी  में  तेरी  वीणा के

झंकृत  होने  का लस हो।

 

अक्षर की  महिमा  क्या  कहना

हर  अक्षर  है   ब्रम्ह  सरीखा

इसको  जिह्वा पर  जब  लावो

ब्रम्हा, हरि, शिव सब बन जाता।

 

अक्षर का संसार विपुल है

जिससे जिह्वा बनी चपल है

अर्थ अनोखे बात निराली

कह जाता हर चंचल पल है।

 

पर मन की वाणी अधरों पर

शोभित हो तो कुछ ऐसी हो

तेरी  वीणा को  झंकृत कर

प्यारी हो वह मधुरस  सी हो।

——-     —-      भूपेंद्र कुमार दवे

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6 Comments

  1. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 20/04/2017
  2. babucm babucm 20/04/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/04/2017
  4. Kajalsoni 22/04/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017

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