रंग लगे अंग

रंग लाए अंग चम्पई

नई लता के

धड़कन बन तरु को

अपराधिन-सी ताके

फड़क रही थी कोंपल
आँखुओं से ढक के
गुच्छे थे सोए

टहनी से दब, थक के

औचक झकझोर गया

नया था झकोरा,

तन में भी दाग लगे

मन न रहा कोरा

अनचाहा संग शिविर का,

ठंडा पा के

वासन्ती उझक झुकी,

सिमटी सकुचा के

 

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