मंज़िल-ए-मक़सूद से जब … Raquim Ali

मंज़िल-ए-मक़सूद से जब
आदमी भटक जाता है
ढूंढ़ता रहता है, तड़प जाता है
सही राह नहीं पाता है।

चलता है अनजान राहों पर
ख़ुद को अकेला पाता है
हर मंज़र पर नज़र आते हैं
कई असबाब डराने वाले;

हसरत भरी निगाहें
दौड़ाता है चारों तरफ
दूर-दूर तलक नज़र
नहीं आते हैं साथ निभाने वाले।

उलझनों में गुज़र जाते हैं
यूं ही ज़िंदगी के अनमोल लम्हे
गहराइयों में डूबता जाता है
हाथ मलता है, कुछ नहीं पाता है।

मंज़िल-ए-मक़सूद…
… र.अ. bsnl

9 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 18/04/2017
  2. mani mani 18/04/2017
  3. babucm babucm 19/04/2017
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 19/04/2017
  5. raquimali raquimali 19/04/2017
  6. Madhu tiwari Madhu tiwari 21/04/2017
  7. Kajalsoni 22/04/2017
  8. raquimali raquimali 22/04/2017

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