मैंने मयंक को देखा! – निहारिका मोहन

आज झरोखे से अचानक,
मैंने, घूरते मयंक को देखा
लालिमा से प्रेरित हुए
गोलाकार प्रकृति-अंग को देखा,
शान्ति-सैलाब लिए हुए
कोहराम को करते भंग देखा;
चंद्रिका से इसकी हर ओर
बढ़ती हुई उमंग को देखा,
भीनी वायु तरंग संग
छितराती हुई मान्द्य को देखा;
शिशुओं को करते हुए आकर्षित,
नभ में एक उज्जवल पात्र को देखा;
इसके कारण उत्तेजित-उत्साहित
हुआँस भरते हुँड़ार को देखा;
निज अभाग्य पर रूठते- पछताते
आह! भरते किशोरों को देखा;

मैंने मयंक को देखा!

– निहारिका मोहन

8 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 17/04/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/04/2017
  3. Kajalsoni 17/04/2017
  4. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 17/04/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 17/04/2017
  6. mani mani 17/04/2017
  7. davendra87 davendra87 17/04/2017

Leave a Reply