हे प्रभू तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो

हे प्रभू

तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो

(ईश्वर निराकार है फिर भी कविता विनंती करती है कि हे ईश्वर! तुमने जो अनुपम सौंदर्य इस सृष्टि को दिया है उससे श्रंगार कर अवतरित हो ताकि हमारा तुम्हारे प्रति प्रेम और भी प्रगाढ़ हो सके।)

हे प्रभू!

तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो।

 

देखो, कलियाँ ओसकण में शरमा रही हैं

पंखुड़ियाँ भोले भ्रमर को तरसा रही हैं

झूल डालियाँ उन्माद में लहरा रही हैं

पराग चूम सुरभि पवन को बहका रही हैं।

 

सृष्टि का यह प्रकट प्रेम भी स्वीकार कर लो।

हे प्रभू!

तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो।

 

कोकिला के कंठ में कामना खिल रही है

बुलबुल के बोल में प्रीत प्रखर दिख रही है

जुगनुओं की लड़ी आरती-सी लग रही है

चेतकी की चाह चेतना बन जग रही है।

 

तुम भी सृष्टि सौंदर्य अंगीकार कर लो।

हे प्रभू!

तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो।

 

रजनी कर श्रंगार चाँद चपल चूमती है

तारों की झिलमिल गगन में कुछ ढूँढ़ती है

लरजती डालियों को वारुणी नहला रही है

औ टपकती बूँद धरा को दमका रही है।

 

मेघ के वन में तुम भी छिप प्यार कर लो

हे प्रभू!

तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो।

 

साँस का सौरभ सतत शिरा में बस रहा है

मन क्यारियों में चिंतन कलरव कर रहा है

चहचहाता प्राण भेद तेरा गुन रहा है

छिप झरोखों में गीत प्रणय का सुन रहा है।

 

तुम भी एकाकी मन का उद्धार कर लो।

हे प्रभू!

तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो।

…. भूपेन्द्र कुमार दवे

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One Response

  1. C.M. Sharma babucm 17/04/2017

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