सजना सँवरना भी – अजय कुमार मल्लाह

यौवन की माया है तेरी कंचन सी काया है,
तूने तासीर-ए-हुस्न में बहुतो को सताया है,
सूख जाएगा एक दिन यौवन का झरना भी,
तब यकीनन भूल जाएगी सजना सँवरना भी।

शीशे में देखकर खुद को इतराना ठीक नहीं,
शायद मालूम नहीं तुझको ज़माना ठीक नहीं,
मुझे मालूम है मेरी बात का विश्वास नहीं तुझे,
पर दिलजलो का दिल यूं जलाना ठीक नहीं,
सीख जाएगी पलभर में मनचलों से डरना भी,
तब यकीनन भूल जाएगी सजना सँवरना भी।

सजती हैं महफ़िलें लोग तुझे याद करते हैं,
तु शरीक जरूर होना ये फरियाद करते हैंं,
ये जलवा तेरी बिजली सी अदाओं का है,
कि इतने लोग तुझपर वक़्त बर्बाद करते हैं,
होगा मंद सूखे पुष्प से खुश्बू का बिखरना भी,
तब यकीनन भूल जाएगी सजना सँवरना भी।

आज तुझे तेरे पीछे दुनिया दीवानी सी लगेगी,
कल तेरी ज़िन्दगी तुझे ही वीरानी सी लगेगी,
फिर ये मत कहना तुझे किसी ने बताया नहीं,
आग मोहब्बत की बुढ़ापे में जवानी सी लगेगी,
इसलिए जरूरी है इस राह चलकर ठहरना भी,
ताकि कहीं भूल ना जाए तु सजना सँवरना भी…….

14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/04/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 15/04/2017
  3. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 15/04/2017
  4. Kajalsoni 16/04/2017
  5. mani mani 16/04/2017
  6. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 16/04/2017

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