रांझे की हीर — डी. के. निवातिया

रांझे की हीर

कल तक करते देखा था मुहब्बत कि खिलाफत जिनको।
आज शिद्दत से करते पाया एक रांझे कि वकालत उनको ।
ऐसा क्या हुआ, फिजा-ऐ-मिजाज़ ही बदल गया पल में ।
बन रांझे की हीर अच्छी लगने लगी जमाने कि जलालत उनको।।



डी. के. निवातिया
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18 Comments

  1. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 13/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017
  2. C.M. Sharma babucm 13/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017
  3. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 13/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017
  4. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 13/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017
  5. Kajalsoni 14/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017
  7. ashwin1827 ashwin1827 16/04/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2017

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