कितना निठुर यह उपहास

कितना निठुर यह उपहास !
जो अजाने ही गया, वह था मधुर मधुमास !
कितना निठुर यह उपहास !!

अश्रु-‘कण’ कहकर जिसे

मैंने बहाया हाय !

सूक्ष्म रूप धरे वही था –

हृदयहारी हास !
कितना निठुर यह उपहास !

स्वप्न-सुख की आस में
सोया रहा दिन-रात,
वह गया नित लौट –
शत-शत बार आकर पास !

कितना निठुर यह उपहास !

(‘रूप-अरूप)

Leave a Reply