सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

 

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

उद्वेलित   होकर  आती  हैं।

जीवन-गाथा  के  पन्नों  पर

शुभाषीश  खुद लिख जाती हैं।

 

सपने  सुन्दर सहज सलोने

आशा की आभा में सजकर

नयनों के  पलनों में  भोले

ममता की गुदड़ी में छिपकर

 

लेकर आते सुख  की घड़ियाँ

जो  रूप नया  दे  जाती हैं

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

उद्वेलित   होकर  आती  हैं।

 

कुछ अनुभव की अनुपम आभा

जीवन  के  आँगन  में  फैली

खेल  खिलाती  सहस्र रश्मियाँ

उतरी  हों  तन मन में  जैसी

 

मीठे मीठे  क्षण  जीवन  के

स्वयं साथ वो ले  आती  हैं

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

उद्वेलित   होकर  आती  हैं।

 

अति सुन्दर शालीन क्षणों की

माला  गुथने  बैठ  गयी  हैं

माणिक, मोती, स्वर्ण  डोर में

महक भक्ति की जोड़ चली हैं

 

 

कर  श्रंगार  अनोखे पल का

वो  सजधजकर  ही आती हैं

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

उद्वेलित   होकर  आती  हैं।

 

बचपन इनके साथ बिता था

माँ की ममता साथ लिये था

मतवाला  यौवन  भी इनके

आलिंगन में  मस्त जिये था

 

अब भी वो मीठी सी घड़ियाँ

यादें  बनकर  आ  जाती हैं

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

उद्वेलित   होकर  आती  हैं।

 

अंत समय भी अच्छा होगा

इस आशा से खुश होता हूँ

पास हृदय के  यादें रखकर

आँख मूँद सुख से सोता हूँ

 

मृत्यु भी दहलीज तक आकर

थपकी  मुझको  दे  जाती हैं

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

उद्वेलित   होकर  आती  हैं।

…  भूपेन्द्र कुमार दवे

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5 Comments

  1. vijaykr811 vijaykr811 10/04/2017
  2. C.M. Sharma babucm 11/04/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/04/2017
  4. Kajalsoni 11/04/2017
  5. mani mani 12/04/2017

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